तलाक़-ए- किनाया और तलाक़-ए-बाऍन सहित सभी एक्स्ट्रा ज्युडिशियल तलाक़ पर सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को नोटिस
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- October 10, 2022
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को तलाक-ऐ- किनाया और तलाक़-ऐ-बाऍन सहित सभी प्रकार की एकतरफ़ा और एक्स्ट्रा ज्युडिशियल तलाकों को अमान्य और असंवैधानिक घोषित करने वाली याचिका पर केंद्र से जवाब माँगा है।
जस्टिस एस ए नज़ीर और जस्टिस जे बी पारदीवाला वाला की पीठ ने इस संबंद में विधि और न्याय मंत्रालय और अल्पसंख्यक मंत्रालय को नोटिस जारी कर उनसे जवाब माँगा है।
शीर्ष न्यायालय कर्नाटक की एक महिला डॉक्टर सय्यदा अंबरीन द्वारा दायर याचिका की सुनवाई कर रहा था। याचिकाकर्ता ने इन प्रथाओं को मनमाना, तर्कहीन और संविधान में प्राप्त मौलिक अधिकारों के विपरीत बताया था।
क्या है मामला ?
अपनी शिकायत में याचिकाकर्ता ने शीर्ष अदालत को बताया था कि उसके माता-पिता को दहेज देने के लिए मजबूर किया गया, बड़ा दहेज न मिलने पर पहले उसके पति ने उसे उसके माता-पिता के घर पर छोड़ दिया और बाद में एक काज़ी और अधिवक्ता के माध्यम से तलाक़ दे दिया था।
पेशे से डॉक्टर याचिकाकर्ता ने शीर्ष अदालत को बताया था कि शादी के बाद भी उसके पिता ने MS की फीस का भुगतान किया और उसे अपने दूसरे खर्चों के लिए भी अपने पिता पर ही निर्भर रहना पड़ता था।
याचिकाकर्ता ने दहेज की मांग पूरी न करने पर उसे पति और उसके परिवार द्वारा गंभीर शारीरिक प्रताड़ना का आरोप भी लगाया था।
याचिकाकर्ता ने अपनी अपील में कहा था कि इमाम, मौलवी और काज़ी इन तलाक़ों का प्रचार-प्रसार और समर्थन करते हैं वह अपने पद, प्रभाव और शक्ति का घोर दुरूपयोग कर मुस्लिम महिलाओं को ऐसे व्यवहार के अधीन करते हैं जो उन्हें संपत्ति के रूप में देखता है,जिस से उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है।
याचिकाकर्ता ने कहा कि जनवरी 2022 में काज़ी के ऑफिस से उसे एक पत्र प्राप्त हुआ था जिसमे उस पर अस्पष्ट आरोप लगाए गए थे। उसके पति की ओर से कहा गया था कि इस संबंध को बनाये रखना संभव नहीं है और उसे वैवाहिक संबंध से मुक्त किया जाता है।
याचिकाकर्ता ने कहा “उन शब्दों को “किनाया ” शब्दों के रूप में जाना जाता है जो अस्पष्ट हों जैसे मै तुम्हे आज़ाद करता हूँ, तुम अब आज़ाद हो, यह संबंध अब मुझ पर हराम है, अब तुम मुझ से अलग हो आदि जिसके माध्यम से तलाक-ऐ- किनाया या तलाक़-ऐ-बाऍन दी जाती है”।
याचिकाकर्ता ने इस संबंध में शीर्ष कोर्ट से सभी नागरिकों के लिए केंद्र को लैंगिक और धार्मिक रूप से निष्पक्ष तलाक की एक समान प्रक्रिया के लिए दिशानिर्देश बनाने हेतु निर्देश देने की मांग की थी।
याचिकाकर्ता ने दहेज की मांग पूरी न करने पर उसे पति और उसके परिवार द्वारा गंभीर शारीरिक प्रताड़ना का आरोप भी लगाया था।